अक्षर: ज
अक्षर 'ज' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंजित्तो करम में लिखो उत्तो कऊँ नई जात।
जितना भाग्य में लिखा है उतना मिल कर ही रहता है।
जित्तो खाबे सबरी बरात। उत्तो खाबे दूला कौ बाप।।
किसी एक आदमी के आदर-सत्कार में बहुत खर्च हो जाना।
जित्तो गुर डारो उत्तोई गुरीरौ होत।
जत मेघ तत वृष्टि जत गुड़ तत मिष्टि- बंगला
जिन घर सास न नंदा, तिन घर बड़े अनंदा।
घर में सास और ननद न होने पर बहू को चैन ही चैन रहता है।
जिन पै नौबतें बजीं, वे उपलन से का छरकें।
जिन पर नौबत बजीं वे कंडों की मार से क्या भयभीत होंगे ? कठिन दुःख जिसने झेले वह साधारण कष्टों की क्या परवा करेगा ?
जी घर नइयाँ बड्डा, सो घर डिग्गमडिग्गा।
बूढ़े-पुराने आदमी के बिना घर का प्रबंध ठीक तौर से नहीं चलता।
जीकी इतै चाहना, ऊ की उतै चाहता।
जिसकी संसार में चाह होती है उसे भगवान् भी चाहते हैं।
जीकी बात की ठीक नई, बाके बाप की ठीक नईं। / जीकी बैन अंदर। ऊको भाई सिकंदर।।
भाई जब ससुराल में अपनी बहिन के पास जाता है तो उसे खूब खाने पीने को मिलता है? और बहिन के कारण वह किसी की परवाह नहीं करता।