बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटल संग्रह
बुंदेलखंड विश्वकोश

अक्षर: स

अक्षर 'स' से शुरू होने वाली कहावतें

arrow_back वापस जाएं

सूप से कऊँ सूरज ढकत हैं ?

सूप से भी कहीं सूर्य ढकता है ?

सूरदास की कारी कामर चढ़ै न दूजौ रंग।

जैसे काली कंबली पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता उसी तरह किसी आदमी के जन्मजात स्वभाव को बदला नहीं जा सकता।

सेंत के धान मौसिया कौ सराध।

दूसरों के पैसे से अपना काम बनाना। मुफ्त का माल लुटाना।

सेर की चार, पसेरी कीं चैया। तुम लेओ चार, हमें देओ चैया।।

सेर की चार और पसेरी की चार, इस तरह चार-चार रोटियाँ बनाओ। चार तुम लो और चार (पसेरीवाली) हमें दो। अपना ही मतलब अधिक देखना।

सेर कों सवा सेर मिलई जात।

सेर को सवा सेर मिल ही जाता है। चालाक के साथ उससे अधिक चालाकी करने वाला मौजूद रहता है।

सेर में पौनी नईं कती।

अभी तो कुछ भी काम नहीं हुआ।

सोउत नार जगाउत।

सोता हुआ नाहर जगाते हैं। बैठे-बिठाये विपत्ति मोल लेते हैं।

सोउत बर जगाउत।

सोती बर्रें जगाते हैं।

सोंज कौ बाप लड़इयन खाओ।

साझे के बाप को सियार खाते हैं। अर्थात साझे का काम सदैव बिगड़ता है।

सोंटा-लँगोटा से।

जैसे कोई हाथ में लकड़ी लेकर और लँगोट पहिन कर घूमता है उस तरह फक्कड़ बन कर घूमना। खाली हाथ फिरना।

सोने में सुहागा।

अच्छा संयोग जुटना। सुहागा सोने को और उज्ज्वल बनाता है।

सोनों छुएं माटी होत।

अभागे कर्महीन के लिए कहते हैं।