अक्षर: स
अक्षर 'स' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंसूरदास की कारी कामर चढ़ै न दूजौ रंग।
जैसे काली कंबली पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता उसी तरह किसी आदमी के जन्मजात स्वभाव को बदला नहीं जा सकता।
सेंत के धान मौसिया कौ सराध।
दूसरों के पैसे से अपना काम बनाना। मुफ्त का माल लुटाना।
सेर की चार, पसेरी कीं चैया। तुम लेओ चार, हमें देओ चैया।।
सेर की चार और पसेरी की चार, इस तरह चार-चार रोटियाँ बनाओ। चार तुम लो और चार (पसेरीवाली) हमें दो। अपना ही मतलब अधिक देखना।
सेर कों सवा सेर मिलई जात।
सेर को सवा सेर मिल ही जाता है। चालाक के साथ उससे अधिक चालाकी करने वाला मौजूद रहता है।
सोंज कौ बाप लड़इयन खाओ।
साझे के बाप को सियार खाते हैं। अर्थात साझे का काम सदैव बिगड़ता है।
सोंज, सगाई, चाकरी (जे) सब राजी के काम। / सोंटा बाजे छमछम, तौ विद्या आवे धमधम।
पिटे बिना विद्या नहीं आती।
सोंटा-लँगोटा से।
जैसे कोई हाथ में लकड़ी लेकर और लँगोट पहिन कर घूमता है उस तरह फक्कड़ बन कर घूमना। खाली हाथ फिरना।