अक्षर: स
अक्षर 'स' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंसाँसी कयें मौसी कौ काजर।
सच कहने से मौसी का काजल ! सच बात कहने से कोई तुनक उठे तब।
सासे न भावे सो बऊए टिकावे।
सास को जो वस्तु अच्छी नहीं लगती वह बहू को देती है। अपने को कोई चीज पसंद न आने पर उसे दूसरों के मत्ये मढ़ना।
सिकअये1 पूत दरबारे नईं जात।
(1-सिखाये हुए) सहज-बुद्धि के बिना कोई काम केवल सिखाने से नहीं किया जा सकता।
सिलारे1 कों सिलारो नईं सुहात।
(1-सिलारा, संस्कृत-शिलकार या शिलोंघवृत्ति खेत में गिरा हुआ अनाज बीननेवाला।) सिलहारे को सिलहारा नहीं सुहाता। एक ही धंधा करने वाले एक दूसरे को नहीं देख सकते।
सींक होकें घुसे, मूसर होकें कड़े।
किसी जगह थोड़ी घुसपैठ करके पूरा अधिकार जमा लेना।
सीख तौ बाकों दीजिए, जाकों सीख सुहाय। / सीख न दीजे बाँदरे, घर बैय्या कौ जाय।।
मूर्ख को उपदेश नहीं देना चाहिए।
सींग टोर बछेरुअन में मिलबो ।
सींग तोड़ कर बछड़ों में मिलना। जेठाई का ध्यान न रख कर लड़कों में उठना-बैठना और हँसना।
सींग मुड़े माथौ उठौ, मों कौ होवे गोल। / रोम नरम चंचल करन तेज बैल अनमोल।।
अच्छे बैल के लक्षण।
सुकौ टरका दॅबो।
कोरा टरका देना। देना-लेना कुछ नहीं, केवल बातों से संतुष्ट करना।
सुक्रवार की रात, करै नईं बात।
लोक-विश्वास है कि शुक्रवार की रात को कोई काम की बात करने से वह सफल नहीं होती।