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अक्षर: स

अक्षर 'स' से शुरू होने वाली कहावतें

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सास मरी, बऊ कौ राज।

सास के मर जाने पर बहू की मौज बनती है।

सास से बैर-परोसिन से नातो।

लड़ाई-झगड़ा करने वाली स्त्री के लिए।

साँसी कयें मौसी कौ काजर।

सच कहने से मौसी का काजल ! सच बात कहने से कोई तुनक उठे तब।

साँसी कौ रंग रूखो।

सच बात रूखी होती है। सुनने में अच्छी नहीं लगती।

सासे न भावे सो बऊए टिकावे।

सास को जो वस्तु अच्छी नहीं लगती वह बहू को देती है। अपने को कोई चीज पसंद न आने पर उसे दूसरों के मत्ये मढ़ना।

सिकअये1 पूत दरबारे नईं जात।

(1-सिखाये हुए) सहज-बुद्धि के बिना कोई काम केवल सिखाने से नहीं किया जा सकता।

सिरा सिरा कें खाओ।

ठंडा करके खाओ। उतावली मत मचाओ। धीरज से काम लो।

सिलारे1 कों सिलारो नईं सुहात।

(1-सिलारा, संस्कृत-शिलकार या शिलोंघवृत्ति खेत में गिरा हुआ अनाज बीननेवाला।) सिलहारे को सिलहारा नहीं सुहाता। एक ही धंधा करने वाले एक दूसरे को नहीं देख सकते।

सिंह के बचा सिंह (ज) ई होत।

सिंह के बच्चे सिंह ही होते हैं।

सींक होकें घुसे, मूसर होकें कड़े।

किसी जगह थोड़ी घुसपैठ करके पूरा अधिकार जमा लेना।

सींग टोर बछेरुअन में मिलबो ।

सींग तोड़ कर बछड़ों में मिलना। जेठाई का ध्यान न रख कर लड़कों में उठना-बैठना और हँसना।

सुकौ टरका दॅबो।

कोरा टरका देना। देना-लेना कुछ नहीं, केवल बातों से संतुष्ट करना।

सुक्रवार की रात, करै नईं बात।

लोक-विश्वास है कि शुक्रवार की रात को कोई काम की बात करने से वह सफल नहीं होती।