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बुंदेलखंड विश्वकोश

अक्षर: स

अक्षर 'स' से शुरू होने वाली कहावतें

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सुनिये सबकी करिये मन की।

बात सबकी सुननी चाहिए, परन्तु करना वही चाहिए जो उचित जान पड़े।

सूई बोलै तो बोलै, चलनी का बोलै, जीमें बहत्तर छेद।

जो स्वयं अवगुणों से भरा है वह भी दूसरों के दोष देखे तो यह हँसी की बात है।

सूकी के संगै तींतीं जर जातीं।

सूखी लकड़ियों के साथ गीली भी जल जाती है। एक के उत्साह से दूसरे भी कुछ न कुछ कर दिखाते हैं।

सूकी जुरें ना, चुपरकें और चार ठउआ।

सूखी तो खाने को नहीं मिलतीं, चुपड़ कर चार और खाने को माँगते हैं !

सूके आम पै टुइयाँ1 नई बैठत।

(1-तोता का बच्चा अथवा मादा तोता।) सूखे आम पर दुइयाँ नहीं बैठती। क्योंकि वहाँ कुछ खाने को नहीं मिलता।

सूके संख बजें दिन राती।

ऊपरी तड़क-भड़क बहुत, पर घर में खाने को नहीं।

सूके हाड़ चबाबो।

भूख से व्याकुल होकर जो मिलै सो खाना।

सूजै न करै, आगौनी1 दिखा ल्याव।

(1-विवाह के दिन लड़की वाले के दरवाजे पर धूमधाम से दूल्हा समेत बरात के आगमन का दृश्य।) आँख से तो दिखायी नहीं देता, और कहते हैं- बरात का जलूस दिखा लाओ।

सूदरे सुदामा।

सुदामा की तरह सीधे। व्यंग्य में।

सूदी उँगरियन घी नईं निकरत।

सीधी बातों से काम नहीं निकलता।

सूदे कौ मों कुत्ता चाटत।

सीधे का मुँह कुत्ता चाटता है।

सूदो नाव महेरी1 को।

(1-मठे के साथ पका कर बनाया गया ज्वार, मक्का आदि का दलिया।) अर्थात हम तो सीधी बात यह जानते हैं। इधर-उधर की बातों का संक्षिप्तीकरण करके कहना।

सूने घर कौ पावनो।

सूने घर का पाहुना, आकर चुपचाप लौट जाता है।

सूनो घर भँड़यन1 कौ राज।

(1-भँड़या, चोर।) जहाँ कोई नहीं होता वहाँ चोर-उचक्कों की बन आती है।

सूप उतार लो, नाव हरई हो जाय।

(1-हलकी) किसी पर बहुत बोझा लदा हो तो थोड़ा कम करने से क्या होता है?