अक्षर: ब
अक्षर 'ब' से शुरू होने वाली कहावतें
arrow_back वापस जाएंबाप गुन बेटा, सिपाही गुन घोड़ा।
बाप के गुणों के अनुसार लड़का होता है और सिपाही के अनुसार घोड़ा।
बाप न अजा, तीसरी पैरी।
बाप भी नहीं, अजा भी नहीं, फिर भी अपने को तीसरी पीढ़ी का बताते हैं। डींग हाँकने वाले के लिए।
बाप न मारी लोखड़ी, बेटा तीरंदाज।
जो लंबी-चौड़ी डींग हाँके उससे व्यंग्य में।
बाप भलो न भैय्या, सब सें बड़ो रुपैय्या।
संसार में रुपया ही सबसे बड़ी वस्तु है।
बाप मरें ना रोये, ससरार गयें ना सोये।
बाप के मरने से बढ़ कर दुःख नही। और ससुराल जाकर सोने से बढ़ कर सुख नहीं।
बाप मरौ सो मरौ, प्रागराज तौ देख आये।
बाप मरा सो मरा प्रयागराज के दर्शन तो कर आये। किसी की कोई बड़ी हानि हो जाने पर सान्त्वना देने के लिए व्यंग्य में।
बाप राज खाये न पान, दाँत निपोरें कड़ गये प्रान।
बाप दादा न खइले पान। दांत बिदोरिके निकलल प्रान।
बाप सें बेटा सयानो, जई जई में गाँव नसानो।
बाप से बेटा अधिक चतुर है, गाँव इसी-इसी में नष्ट हुआ। बड़े-बूढ़ों के आगे जहाँ लड़के हर बात अपनी चलाते हों वहाँ कहते हैं।
बाप सें बैर, पूत सें सगाई।
बाप से बोलचाल नहीं, लड़के से मित्रता। जिससे काम बन सकता है उससे बात न करना।
बाप-बेटा की बरात, मताई-बिटिया गौरैयाँ1।
(1-विवाह उत्सवादि के अवसर पर विशेष रूप से भोजन के लिए आमंत्रित की जाने वाली बिरादरी की सधवा स्त्रियाँ, गौर।) लड़के के विवाह में पिता-पुत्र तो बराती बनें, और माँ-बेटी गौर। जहाँ कोई काम अकेले ही कर लिया जाय और मित्रों को न पूछा जाय वहाँ कहते हैं।
बाबा कौ जी बगली1 में।
(1-माला रखने की थैली।) साधू को अपनी बगली ही प्यारी होती है।
बाबा जू के जटा आसीरबाद मेंइ गये।
जब कोई आदमी झूठी वाहवाही में अपना पैसा लुटा दे तब कहते हैं। मुल्ला की दाढ़ी तबर्रुख में गयी।
बाबा बैठे ई घर में, पाँव पसारें ऊ घर में।
बाबा बैठते हैं इस घर में, और पाँव पसारते हैं उस घर में। जब कोई आदमी।। व्यर्थ अपने लिए बहुत सी जगह घेर रखे, अथवा जबर्दस्ती दूसरे के काम में जाकर हस्तक्षेप करे तब।
बाबा1 के कान।
(1-सर्प) किसी एक व्यक्ति के कान में धीरे से कही गयी बात जब दूसरा सुन ले तब कहते हैं कि इसके बाबा के कान हैं।
बाबाजू1 के बाबा जू, दरबटना के दरबटना।
(1-ग्राम देवता।) एक वस्तु से कई काम निकलना।
बामी ढिंगा मरे, साँप कौ नाव।
साँप के बिल के पास कोई मरे तो उससे साँप का ही नाम होता है कि उसने काटा।
बार उखारें मुरदा हलको नईं होत।
नाममात्र के सहारे से कोई बड़ा काम पूरा नहीं होता।
बार सी बारीकी और मूसर सो भर्रों।
एक-एक पैसे का हिसाब रखना, परन्तु हद दर्जे की फिजूलखर्ची भी करना।