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बुंदेलखंड विश्वकोश

अक्षर: ब

अक्षर 'ब' से शुरू होने वाली कहावतें

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बिच्छू कौ काटो चोर, न हूँ करै न चूँ।

बदमाश आदमी चुपचाप पिटने पर ठीक रहता है।

बिच्छू कौ मंतुर जानें नई, साँप के बिले में हात डारें।

बिच्छू का तो मंत्र नहीं जानते साँप के बिल में हाथ डालते हैं।

बिछौनन सें लग गये।

बहुत दुर्बल हो गये हैं; बचना कठिन है।

बिटिया और गैया कों जाँ दोरो मिलत ताँ जात।

लड़की बिनब्याही नहीं रहती। कहीं न कहीं ठिकाने लग ही जाती है।

बिटिया कौ माँगौ होय, बहू कौ माँगौ न होय।

घर में लड़‌की की ही बात अधिक चलती है। बहू की नहीं।

बिटिया सोहे सासरें, हाती सोहे हतसार।

लड़की तो ससुराल में ही शोभा देती है और हाथी हथसार में।

बिद गओ सो मोती।

जो काम सफल हो वहीं सच्चा काम। छेद करते समय मोती टूट जाय तो बेकार हो जाता है।

बिदा होय तौ रोउन लगैं, नईं तौ लै पिरिया कंडन कों जायँ।

बिदा हो रही हो तो रोने बैठ जायें, नहीं तो पिरिया लेकर कंडा बीनने जायें। किसी काम में हमारी आवश्यकता हो तो बैठें, अन्यथा अपना दूसरा काम देखें।

बिन कड़ुआ को दिवार ?

बिना ऋण निकाले कौन देनेवाला ? अथवा जिस पर अपना रुपया उधार खाना हो वही माँगने पर दे सकता है, दूसरा कौन देगा ?

बिन कुत्तन को गाँव बिलो अलबेली डोलें।

जिस गाँव में कुत्ते नहीं होते वहाँ बिल्ली छैल-छबीली बनी घूमती है। जहाँ कोई देखनेवाला नहीं वहाँ धूर्त्‍तों की बन आती है।

बिन घरनी घर भूत कौ डेरा।

स्त्री के बिना घर भूत का डेरा है।

बिन देखो चोर साव बिरोबर।

चोर को जब तक चोरी करते पकड़ न लिया जाय तब तक वह ईमानदार ही समझा जाता है।

बिन पइसन कौ तमासो।

बिना पैसों का तमाशा। ऐसा लड़ाई-झगड़ा जिसमें देखने वाले आनंद लें।

बिन पइसा के परखें मोल, तिनको नाव संखढपोल।

बिना पैसों के जो किसी वस्तु को खरीदने की इच्छा करते हैं वे ढपोलशंख कहलाते हैं।

बिन पंखन के उड़े चाउत।

बिना पंखों के उड़ना चाहते हैं। पर्याप्त साधन के बिना काम करता।

बिना नाथ के पड़ा।

मनचाही करने वाला स्वतंत्र आदमी।